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मान अपमान

कहानी



मान अपमान
बहुत पुराने समय की बात है ,किसी शहर में हरिहर नाम का एक कृष्‍ण भक्‍त रहा करता था । वह प्रतिदिन भोर में शहर के तालाब के किनारे निर्मित कृष्‍ण मन्दिर में जाकर दीपक जलाया करता था ।
हरिहर बडा ही भक्त,सत्‍यनिष्‍ठ तथा विनम्र स्‍वभाव का व्‍यक्ति था । वह किसी पर क्रोधित नहीं होता था बल्कि क्रोधित व्‍यक्ति से भी बडे प्रेम और उदारता से पेश आता था । हरिहर की उदारता को देखकर उनके परिजन उससे नाराज रहने लगे क्‍योंकि वह उदारमना हर किसी की सहायता किया करता था । उसके परिजनों ने उसे बहुत समझाया किन्‍तु हरिहर की उदारता कम नहीं हुई । परिणामस्‍वरूप हरिहर के परिजनों ने उसे घर से निकाल दिया । संसार में भक्ति भावना कुछ लोगों के लिए श्रद्धा का विषय है तो कुछ के लिए आलोचना तथा मजाक का हुआ करता है । इतिहास बताता है कि श्रद्धालुओं के प्रति लोगों की मानसिकता ठीक नहीं रही है । इसके बावजूद लोगों व्‍दारा किए गए उपहास,आलोचना और मजाक पर हरिहर ध्‍यान नहीं देता था और न कभी वह बुरा मानता था । कोई कुछ भी कहें वह उसी तरह अपनी राह पर चलता था जैसे हाथी किसी की परवाह किए बिना अपनी राह पर चलता रहता है। हरिहर जब भी मन्दिर से लौट रहा होता या किसी रास्‍ते से आ जा रहा होता,मजाकिया और बुरे संस्‍कार वाले लोग उसका उपहास किया करते । यहॉं तक क‍ि कोई उसे गाली देकर कर पत्‍थर गोबर आदि फेंक कर मार दिया करते । बावजूद इसके हरिहर किसी को बिना कुछ कहे 'हरे कृष्‍ण, हरे कृष्‍ण ' करते हुए हुए अपनी राह निकल जाया करता । जब बडे लोग इसी तरह की हरकत करते तो उन्‍हें देख बच्‍चे हरिहर के पीछे पडते । उस पर पत्‍थर फेंकने लगते । बच्‍चों को बडा मजा आता था और लोग इस मजाक का आनन्‍द उठाया करते । सीमा से अधिक तिरस्‍कार होने पर भी हरिहर एकाग्रता से हरे कृष्‍ण करते हुए ऐसे चलने लगता जैसे कुछ हुआ ही न हो । शहर में एक कृष्‍ण भक्‍त वस्‍त्र व्‍यापारी श्रीधर की दुकान चौक पर हुआ करती थी । वे प्रतिदिन हरिहर पर होनेवाले इस मजाक और उपहास को चुपचाप देख लिया करते थे । वे समझ नहीं पा रहे थे कि हरिहर इतना अपमान होने पर भी सहते चले जा रहे थे । श्रीधर,हरिहर की सहनशीलता की हद तक पहुँचकर भी हरिहर को समझ नहीं पा रहे थे । एक दिन श्रीधर दुकान के बाहर चौक पर खड़े रहे ताकि जब भी हरिहर इस रास्‍ते से गुजरे और कोई उनका अपमान करें तो अपमान करनेवालों को रोक सकें । दूर से हरिहर को आता देख मनचले लोग लोग और बच्‍चे शोर बचाने लगे । हरिहर हरे कृष्‍ण करते हुए जब करीब आये तो मनचले युवकों और बच्‍चों ने हरिहर को अपमानित करना शुरू कर दिया । श्रीधर से देखा नहीं गया और उन्‍होने उन मनचले युवकों और बच्‍चों को डांटा । श्रीधर ने हरिहर को प्रणाम किया । हरिहर ,श्रीधर के पास आकर खड़े हो गए । श्रीधर अब भी मनचले युवकों और बच्‍चों को डांट रहे थे । मनचले युवक और बच्‍चे शान्‍त हो गए । युवकों और बच्‍चों के जाने के बाद श्रीधर ने हरिहर से पूछा –



‘’महाराज,आप इन लोगों को कुछ कहते क्‍यों नहीं ।ये बराबर आपको अपमानित और लज्जित किए जा रहे हैं फिर भी आप इतने शान्‍त और चुपचाप है ।‘’ ‘’मुझे एक वस्‍त्र दीजिए ।‘
श्रीधर ने अपनी दुकान से वस्‍त्र का एक बड़ा टुकड़ा दिया । हरिहर ने उस वस्‍त्र के दो भाग किए । श्रीधर बोले- ‘’महाराज ,आपने यह क्‍या किया ।‘’ ‘’अब तुम यह दोनों टुकड़े मेरे कांधों पर एक एक करके डाल दो ।‘’ ‘’ लेकिन महाराज ;;;;;;;;;;;’’ ‘’ मेरे लौटने की प्रतीक्षा करना । इसका आपको समुचित जवाब मिलेगा ।‘’ श्रीधर ने लोगों में थी उतनी ही सज्‍जनों में भी थी । वे श्रीधर की दुकान से श्रीकृष्‍ण मन्दिर तक चलते गए और उसी रास्‍ते से लौट चले । जब कोई श्रद्धा पूर्वक उनका अभिवादन करता तो वे कांधे पर रखे वस्‍त्र में गांठ बांध दिया करते । इसी तरह जब कोई उनका अपमान या उपहास करता तो वे दूसरे कांधे पर रखे वस्‍त्र में गांठ बांध दिया करते । श्रीधर की दुकान तक लौटते लौटते दोनों कांधों पर वस्‍त्र में ढेर सारी गठांने बंध चुकी थी । हरिहर को आता देख श्रीधर ने उनकी अगुवानी की । हरिहर ने अपने कांधे पर रखे वस्‍त्र की गठानें बंधे टुकड़े श्रीधर के हाथों में देते हुए कहा -
‘’ इन दोनों टुकड़ो को अलग अलग तोलो ।‘’ श्रीधर ने दोनों टुकड़ो को अलग अलग तोला । हरिहर ने श्रीधर ने पूछा - ‘’ क्‍या दोनों वस्‍त्रों और उनकी गठानों में कोई फर्क पडा ।‘’ ‘’ महाराज ,दोनों का वजन एक समान है ।‘’ ‘’ शायद अब तुमको तुम्‍हारे प्रश्‍न का उत्‍तर मिल गया होगा ।‘’ ‘’ मैं समझा नहीं महाराज ,हम निर्बल बुद्धियों को ये सब समझ में नहीं आता ।‘’ ‘’ हे श्रीधर , जीवन में सत्‍य मार्ग पर मान और सम्‍मान दोनों बराबर मिलता ही है । इनका अनुभव तो होता है किन्‍तु वास्‍तव में मान और सम्‍मान का कोई अस्तित्‍व ही नहीं होता । यदि इस सत्‍य को समझ लिया जाय तो मन पर इन चीजों का कोई प्रभाव नहीं पडता । इसलिए मान और अपमान को समान समझने पर कोई कष्‍ट भी नहीं होता । मन स्‍वयं ही आनन्‍द में मगन रहता है ।
अस्वीकरण