नवदुनिया में विनय उपाध्याय की टिप्पणी पढ़ी।स्व.प्रभुदयाल अग्निहोत्री के पुत्र विवेक एवं उनकी पुत्रवधु पल्लवी जोशी ने कहा कि भोपाल के लेखक बिदारी की नज्ब पहचान गए ।मैं विवेक और पल्लवी के कथन से पूर्णतः सहमत हूं। भोपाल के एक व्हीआईपी वर्ग के लेखक बिरादरी के बारे में अभी गत सप्ताह मृदुला जी ने भी टिप्पणी की थी कि व्हीआईपी वर्ग के लेखक बिरादरी की मानसिकता संकीर्णस्तर की है।लेखन से नहीं लेखक से वास्ता होता है। यह वर्ग लेखन की नहीं लेखक की बात करता है।साफगोई में कहूं तो एक दूसरे का मुंह चाटते नज़र आते हैं।यह मेरा लम्बा अनुभव रहा है। मैंने अनेकों के बार इन व्हीआईपी वर्गनुमा लेखक बिरादरी के समक्ष,जांच के लिए,कुछ रचनाएं रखी,जिन्होंने उन रचनाओं को खारिज कर दिया,लेकिन दुःख की बात है कि वे यह नहीं जान पाए कि जिनकी रचनाएं उन्होने खारिज की है,वे रचनाएं उन्ही की बिरादरी के लेखक की है । खैर,मेरा आशय आप समझ गए होंगे । कुछ ऐसी ही स्थिति प्रिंट एवं इलेक्टानिक मीडिया की है।
सादर,
कृष्णशंकर सोनाने
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